आज दोपहर में मायावती मंत्रिमंडल ने अपनी कृषि नीति वापस ले ली इस निर्णय को जनतांत्रिक संघर्षों की जीत समझा जा सकता है । यह निर्णय तात्कालिक भी हो सकता है क्योंकि पूँजी वो भी प्राइवेट कॉरपोरेट पूँजी अपने लिए नए रास्ते तलाश करती है और भारत के संदर्भों में देखें तो विश्व बैंक और एशिआई विकास बैंक और अन्य बहु पक्षीय समझौतों की शर्तों के तहत देश के आम लोगों की जरूरतों में शर्तों के रुप में प्रायवेट कॉरपोरेट निवेश को लादते रहे हैं । नए कृषि नीति की वापसी तात्कालिक ही सही जन पक्षधरता के लोगों की जीत तो है ही लेकिन हमेशा की तरह यह मात्रा अर्ध विराम ही है ।
इस प्रक्रिया में सेंटर फ़ॉर कोन्तेम्परारी स्टडीज ऎंड रिसर्च , इंसाफ़ , भारतीय किसान यूनियन एवं अन्य संगठनो के साथ मीडिया की भूमिका साधुवाद की पात्र है लेकिन गौर कीजिये दबे पावों कथित पब्लिक प्रायवेट पर्त्नेर्शिप के नाम पर अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में कॉरपोरेट कैपिटल की तय्यारी है उम्मीद है जन पक्षीय आवाजें असर कराती रहेंगी
संजय
Thursday, August 23, 2007
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